धर्म-अध्यात्म

आखिर पूजा के दौरान माला में क्यों होते हैं सिर्फ 108 दाने? जानिए यज्ञ के समय क्यों करते हैं इस माला का प्रयोग

भारतीय पूजा पद्धति में ध्यान यानि मेडिटेशन को सबसे ज्यादा प्रभावी और महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि ध्यान की अतल गहराइयों में उतरने के बाद आत्मा का परमात्मा से साक्षात्कार हो जाता है। यह भक्त की भगवान से संवाद स्थापित करने की राह मानी जाती है। धर्मशास्त्रों में कितने ही मनुष्यों, देवताओं और असुरों तक का वर्णन मिलता है, जिन्होंने वर्षों तपस्या कर, ध्यान लगाकर परमात्मा के साक्षात दर्शन और मनचाहे वरदान पाए। अर्थात ध्यान एक ऐसी शक्ति है, जो भगवान को भी प्रकट होने पर विवश कर देती है।

जप काल में मंत्रों की गणना के लिए माला एक सर्वश्रेष्ठ साधन मानी गई है। मनोवांछित फलों को प्राप्त करने के लिए मंत्र जप की एक निश्चित संख्या का पूरा होना अनिवार्य होता है। वैसे उंगलियों के पोर, फूल, चावल के दाने आदि की सहायता से भी लोग जप करते हैं लेकिन ये माध्यम अल्पसंख्या वाले जप के लिए तो ठीक हैं लेकिन लंबे समय तक चलने वाले हजारों लाखों की संख्या वाले जप इनके द्वारा शुद्ध रूप में पूरे नहीं किए जा सकते। इसीलिए निश्चित गणना, सुविधा और वस्तुगत प्रभाव के लिए माला का प्रयोग ही उचित है। माला में 108 ही दाने क्यों होते हैं? इसके पीछे कई धार्मिक, ज्योतिष और वैज्ञानिक मान्यताएं हैं।

आइए हम आपको बताते हैं ऐसी चार मान्यताओ के बारे में तथा साथ ही जानेंगे आखिर क्यों करना चाहिए मंत्र जाप के लिए माला का प्रयोग

हमारे ज्ञानी साधुजनों ने धार्मिक कार्यों में उपयोग की जाने वाली हर वस्तु को अनंत वैज्ञानिक शोध के बाद निर्दिष्ट किया है। पूजा की हर वस्तु उससे निकलने वाली तरंगों और प्रकृति पर पड़ने वाले उसके प्रभाव के अनुरूप मान्य की गई हैं। जाप की माला के लिए भी प्रकृति के विभिन्न ग्रहों, नक्षत्रों और राशियों की गणना करके ही मनकों की संख्या निर्धारित की गई है। माला के 108 मनके की संख्या का आधार यह गणना है- ब्रह्मांड में नवग्रहों को ज्योतिषीय गणना में लिया गया है। इसी तरह समस्त व्यक्तियों के भाग्यफल के अध्ययन के लिए कुल 12 राशियां निर्धारित की गई हैं। अब 9 ग्रहों और 12 राशियों को गुणा यानि मल्टीप्लाय किया जाए तो जो संख्या सामने आती है, वह है 108। इसी प्रकार भारतीय पंचांग 27 नक्षत्रों की भी गणना करता है।

षट्शतानि दिवारात्रौ सहस्राण्येकं विशांति – इस श्लोक के अनुसार एक पूर्ण रूप से स्वस्थ व्यक्ति दिनभर में जितनी बार सांस लेता है, उसी से माला के दानों की संख्या 108 का संबंध है। सामान्यत: 24 घंटे में एक व्यक्ति करीब 21600 बार सांस लेता है। दिन के 24 घंटों में से 12 घंटे दैनिक कार्यों में व्यतीत हो जाते हैं और शेष 12 घंटों में व्यक्ति सांस लेता है 10800 बार। इसी समय में देवी-देवताओं का ध्यान करना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार व्यक्ति को हर सांस पर यानी पूजन के लिए निर्धारित समय 12 घंटे में 10800 बार ईश्वर का ध्यान करना चाहिए, लेकिन यह संभव नहीं हो पाता है। इसीलिए 10800 बार सांस लेने की संख्या से अंतिम दो शून्य हटाकर जप के लिए 108 संख्या निर्धारित की गई है। इसी संख्या के आधार पर जप की माला में 108 दाने होते हैं।

एक मान्यता के अनुसार माला के 108 दाने और सूर्य की कलाओं का गहरा संबंध है। एक वर्ष में सूर्य 216000 कलाएं बदलता है और वर्ष में दो बार अपनी स्थिति भी बदलता है। छह माह उत्तरायण रहता है और छह माह दक्षिणायन। अत: सूर्य छह माह की एक स्थिति में 108000 बार कलाएं बदलता है। इसी संख्या 108000 से अंतिम तीन शून्य हटाकर माला के 108 मोती निर्धारित किए गए हैं। माला का एक-एक दाना सूर्य की एक-एक कला का प्रतीक है। सूर्य ही व्यक्ति को तेजस्वी बनाता है, समाज में मान-सम्मान दिलवाता है। सूर्य ही एकमात्र साक्षात दिखने वाले देवता हैं, इसी वजह से सूर्य की कलाओं के आधार पर दानों की संख्या 108 निर्धारित की गई है।

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