प्रभु यीशु का भारत से रहा है गहरा नाता,देखिए……

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आपको बता दें के 12 वर्ष की आयु तक जीसस की गतिविधियों का उल्लेख बाइबल में मिलता है, जब उन्हें यरुशलम में तीन दिन रुककर पूजास्थलों में उपदेशकों के बीच में बैठे, उनकी सुनते और उनसे प्रश्न करते हुए पाया गया और इसके बाद तेरह से उनतीस साल के जीसस के जीवन के बारे में कहीं कोई उल्लेख नहीं मिलता।

वहीं,जीसस के जीवन के इन रहस्यमय वर्षों को ईसाई जगत में साइलेंट ईयर्स, लॉस्ट ईयर्स या मिसिंग ईयर्स कहा जाता है और उसके बाद जीसस ने सीधे तीस वर्ष की उम्र में यरुशलम लौटकर यूहन्ना से दीक्षा ली और चालीस दिनों के उपवास के बाद लोगों को धार्मिक शिक्षा देने लगे। अंततः तैतीस साल की उम्र में उन्हें क्रूस पर लटका दिया गया।

लेकिन 1887 ई में रूसी विद्वान और खोजकर्ता नोटोविच ने पहली बार जीसस के ‘लॉस्ट ईयर्स’ की खोज की और इस रहस्यमय कालखंड में उनके भारत में रहने का रहस्योद्घाटन किया था। कश्मीर भ्रमण के दौरान जोजीला दर्रे के समीप एक बौद्धमठ में नोटोविच की मुलाकात एक बौद्ध भिक्षु से हुई थी, जिसने उन्हें बोधिसत्व प्राप्त एक ऐसे संत के बारे में बताया, जिसका नाम ईसा था। भिक्षु से विस्तृत बातचीत के बाद नोटोविच ने ईसा और जीसस के जीवन में कई समानताएं रेखांकित की। उसने लद्दाख के लेह मार्ग पर स्थित प्राचीन हेमिस बौद्ध आश्रम में रखी कई पुस्तकों के अध्ययन के बाद ‘द लाइफ ऑफ संत ईसा’ नामक एक पुस्तक लिखी।

इस बेहद चर्चित किताब के अनुसार, इस्राइल के राजा सुलेमान के समय से ही भारत और इस्राइल के बीच घनिष्ठ व्यापार-संबंध थे। भारत से लौटने वाले व्यापारियों ने भारत के ज्ञान की प्रसिद्धि के किस्से दूर-दूर तक फैलाए थे। इन किस्सों से प्रभावित होकर जीसस ज्ञान प्राप्त करने के उद्धेश्य से बिना किसी को बताए सिल्क रूट से भारत आए और सिल्क रूट पर स्थित इस आश्रम में तेरह से उनतीस वर्ष की उम्र तक रहकर बौद्ध धर्म, वेदों तथा संस्कृत और पाली भाषा की शिक्षा ली। उन्होंने संस्कृत में अपना नाम ईशा रख लिया था, जो यजुर्वेद के मंत्र में ईश्वर का प्रतीक शब्द है। यहां से शिक्षा लेकर वे यरुशलम लौट गए थे।

जीसस के भारत आने का एक प्रमाण हिन्दू धर्मग्रन्थ ‘भविष्य पुराण’ में भी मिलता है, जिसमें जिक्र है कि कुषाण राजा शालिवाहन की मुलाकात हिमालय क्षेत्र में सुनहरे बालों वाले एक ऐसे ऋषि से होती है, जो अपना नाम ईसा बताता है और लद्दाख की कई जनश्रुतियों में भी ईसा के बौद्ध मठ में रहने के उल्लेख मिलते हैं। विश्वप्रसिद्ध स्वामी परमहंस योगानंद की किताब ‘द सेकंड कमिंग ऑफ क्राइस्ट: द रिसरेक्शन ऑफ क्राइस्ट विदिन यू’ में यह दावा किया गया है कि ईसा ने भारत में कई वर्ष रहकर भारतीय ज्ञान दर्शन और योग का गहन अध्ययन और अभ्यास किया था। स्वामी जी के इस शोध पर ‘लॉस एंजिल्स टाइम्स’ और ‘द गार्जियन’ ने लंबी रिपोर्ट प्रकाशित की थी, जिसकी चर्चा दुनिया भर में हुई। इएन कॉल्डवेल की एक किताब ‘फिफ्थ गॉस्पेल’ जीसस की जिन्दगी के रहस्यमय पहलुओं की खोज करती है। इस किताब का भी यही मानना है कि तेरह से उनतीस वर्ष की उम्र तक ईसा भारत में रहे।

कश्मीर में उनकी समाधि को लेकर बीबीसी द्वारा एक खोजपूर्ण और बेहद चर्चित रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी, जिसके अनुसार श्रीनगर के पुराने शहर में ‘रोज़ाबल’ नाम की पत्थर से बनी एक इमारत है। इस इमारत में एक मकबरा है, जहां ईसा मसीह का शव रखा हुआ है। यह कब्र किसी मुस्लिम की नहीं हो सकती, क्योंकि इसका रुख उत्तर-पूर्व की तरफ है। इस्लाम में कब्र का सिर मक्का की ओर होता है। स्थानीय लोगों का मानना है कि यह यूजा असफ की कब्र है, जो दूर देश से यहां आकर रहा था। ईरान में यात्रा के दौरान जीसस को यूजा असफ के नाम से ही जाना जाता था।

कब्र के साथ ही यहां कदमों के निशान भी उकेरे गए हैं और पैरों के ये निशान जीसस के पदचिन्हों से मेल खाते हैं, क्योंकि इन पर पैरों पर कील ठोकने के चिन्ह मौजूद हैं। अब तक की खोजों से यह माना जाने लगा है कि जीसस का आरंभिक और आखिरी समय भारत में ही बीता था। उन्हें भारत, उसकी संस्कृति और उसकी धार्मिक-आध्यात्मिक परंपराओं से प्यार था। यह बात और है कि तमाम शोध और प्रमाणों के बावजूद चर्च इन बातों को स्वीकार नहीं करता।